आखिर कैसे चवन्नी से बना चावड़ी बाजार? दिल्ली के चावड़ी बाजार के नाम के पीछे एक बेहद ही रोचक कहानी
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आखिर कैसे चवन्नी से बना चावड़ी बाजार? दिल्ली के चावड़ी बाजार के नाम के पीछे एक बेहद ही रोचक कहानी

भारत देश की राजधानी दिल्ली में कई जगहें बेहद खास हैं। इन्हीं में से एक है चावड़ी बाजार। यहां घनी आबादी है। चावड़ी बाजार दिल्ली के बड़े थोक मार्केट में से एक है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के चावड़ी बाजार का नाम कैसे पड़ा और इसका अर्थ क्या होता है। आज हम आपको दिल्ली के चावड़ी बाजार के नाम की कहानी और इसके इतिहास को बताएंगे

चावड़ी बाजार के नाम के पीछे बड़ी रोचक कहानी है। इसका नाम मराठी शब्द ‘चावरी’ से पड़ा है। चावरी शब्द का मतलब होता है बैठने की जगह। बताया जाता है कि पहले यहां एक कुलीन के घर एक सभा होती थी, जो एक तरह की पंचायत की तरह थी, जहां लोग आते थे और उनकी समस्याओं को निपटाने की कोशिश की जाती थी।

इसके अलावा चावड़ी बाजार के नाम के पीछ एक और कहानी प्रचलित है। कुछ रिपोर्टे में बताया गया कि यह कभी 19वीं शताब्दी में अपनी नृत्य करने वाली लड़कियों और तवायफों के लिए जाना जाता था, इस इलाके में उस वक्त अमीरों का आना-जाना बना रहता था। ये लोग उन्हें नृत्य के बदले चवन्नियां देते थे और इस तरह धीरे-धीरे यहां का नाम ‘चवन्निस’ और फिर बाद में ‘चावरी’ पड़ गया।

लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद तवायफों की संस्कृति खत्म हो गई। इसके बाद, वेश्याएं बाजार की ऊपरी मंजिलों पर कब्जा करने के लिए आईं लेकिन दिल्ली के नगर निगम द्वारा उन्हें हटा दिया गया। बाद में चावड़ी बाजार की स्थापना 1840 में एक हार्डवेयर बाजार के रूप में हुई। यह पुरानी दिल्ली का पहला थोक बाजार था। अब दिल्ली की चावड़ी बाजार पीतल, तांबे और कागज उत्पादों का एक विशेष थोक बाजार है।

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