बाहुबली आनंद मोहन सिंह पर क्यों मेहरबान नीतीश सरकार
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बाहुबली आनंद मोहन सिंह पर क्यों मेहरबान नीतीश सरकार

बिहार की राजनीति में इन दिनों में बडी हलचल मची है, बिहार की राजनीति में हमेशा बहुत कुछ ऐसा होता है, जो अनुमानों से परे होता आया है. वहां की राजनीति अपने ही अंदाज में अजीबोगरीब करवट लेती है, खासकर तब और ज्यादा, जब चुनाव आने वाले होते हैं. जैसे भाजपा के साथ सालों- साल गठबन्घन तोडकर नीतिस कुमार ने लालू प्रसाद के साथ हाथ मिलाया, यह बिहार की राजनीति में कई दशकों के बाद बडी घटना थी किन्तु 2020 आते-आते नीतीश और लालू की पार्टी अलग हो गई और भाजपा के साथ दोबारा सरकार बना ली, ठीक इस समय बिहार की राजनीति में क्या चल रहा है समझ से परे है जेल मैन्युअल बदलाव से मुश्किल से 11 दिनों पहले जब सीएम नीतीश कुमार ने राज्य के जेल मैन्युअल में बदलाव किया तो अंदाज हो गया था, वो क्या करने वाले हैं. इसके साथ इस सूबे की सियासत करवट लेनी लगी. 30 साल पहले एक आईएएस की हत्या में उम्र कैद की सजा कट रहे आनंद मोहन सिंह तोमर के रिहा होने के बाद अब राज्य की राजनीति में नई सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है.कहा जाने लगा है कि सियासत अब गलत-सही, अच्छे-खराब से परे जाकर फायदों और वोट बैंक के रास्तों को राजमार्ग में बदलने लगी है. बिहार में उसी सियासी रास्ते का एक हिस्सा अब आनंद मोहन सिंह बनने वाले हैं. सियासी विश्लेषकों ने अंदाज लगा रहे हैं कि इस रिहाई कौन से तीर साधे जाने वाले हैं. किसी नफा होगा और किसे नुकसान.

आखिर कौन है आनंद मोहन सिंह
सहरसा जिले के पंचगछिया गांव से आने वाले स्वतंत्रता सेनानी के पोते आनंद मोहन सिंह को जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से पहले अलग तरह से जाना जाता था। राजपूत समाज से आने वाले आनंद मोहन उस वक्त कोई बाहुबली नेता नहीं बल्कि स्वतंत्रता सेनानी राम बहादुर सिंह के पोते थे। सत्तर के दशक में समाजवादी राजनीति की आंधी उठी जिसमें आनंद मोहन भी शामिल हो लिए। 1974 में वो कॉलेज ड्रॉपआउट होकर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में अपनी भागीदारी निभा रहे थे। ये देखना भी दिलचस्प है कि कैसे समाजवादी विचारधारा से प्रभावित होकर राजनीति में उतरने वाला 17 साल का एक लड़का आगे चलकर जाति विशेष का प्रतिनिधि और बाहुबली नेता बन जाता है।

आनंद मोहन सिंह को किस मामले में उम्रकैद हुई
जिस मामले में उन्हें हाईकोर्ट से उम्रकैद की सजा हुई. वो 05 दिसंबर 1994 की है. उन दिन मुजफ्फरपुर के गोपालगंज में नाराज भीड़ ने जिलाधिकारी जी कृष्णैया को पीट-पीटकर क्रूर तरीके से मार डाला था. कृष्णैया 1985 के बैच के ईमानदार आईएएस अधिकारी थे, जो तेलंंगाना के महबूबनगर के रहने वाले थे. बताया जाता है कि वह बहुत मामूली दलित परिवार से ताल्लुक रखते थे. अपनी पढ़ाई के दौरान उन्होंने कुली तक का काम किया था. अपनी प्रतिभा के बल पर वह आईएएस बने थे

आनंद मोहन के रिहाई से किसी नफा होगा और किसे नुकसान.
दरअसल, एक जमाने में बिहार पीपुल्स पार्टी की स्थापना कर क्षत्रिय राजनीति का पूरा सिस्टम खड़ा कर रहे आनंद मोहन को आज भी बिहार की राजनीति में राजपूतों के बीच प्रभावी माना जाता है। वह कितने प्रभावी बचे हैं, यह 2024-25 के लोकसभा-विधानसभा चुनावों में पता चलेगा। वह किसके साथ रहते हैं, यह भी काफी हद तक निर्भर करेगा। इसके अलावा यह भी बड़ी बात है कि 1994 से 2005 के बीच का यह बिहार नहीं बचा है। तब और अब के युवाओं की मनोदशा में काफी अंतर है। राजनीतिक रूप से उर्वर बिहार में अब आनंद मोहन राजपूतों का वोट कितना घुमा सकेंगे, यह अभी तीर या तुक्का ही है।

कौन सा जेल मैन्युअल नियम बदला
26 मई 2016 को जेल मैनुअल के नियम 481(i) (क) में कई अपवाद जुड़े, जिसमें काम पर तैनात सरकारी सेवक की हत्या जैसे जघन्य मामलों में आजीवन कारावास भी था. अब नियम के मुताबिक ऐसे मामले में सजा पाए कैदी की रिहाई नहीं होगी और वह सारी उम्र जेल में ही रहेगा. अप्रैल 2023 में इसमें सरकारी सेवक शब्द हटा दिया गया. अब ऐसी सजा पाए अपराधियों की 14 साल में रिहाई का रास्ता खुल गया है.

रिहाई का विरोध
हाल ही में जब उनके बेटे की सगाई हुई तो सहरसा में उनके आवास पर कई नेताओं का जमावड़ा हुआ. हालांकि उनकी रिहाई का विरोध भी हो रहा है. बीजेपी इसका विरोध कर रही है. आईएएस एसोसिएशन ने भी इसका विरोध किया है. जी कृष्णैया की विधवा और बेटी ने इसे चिंताजनक करार दिया है

भाजपा नेता अश्विनी चौबे रिहाई पर उठाए सवाल
गोपालगंज के तत्कालीन डीएम की मौत पर अश्विनी चौबे ने कहा कि जिलाधिकारी की क्या गलती थी? यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी, लेकिन जिस प्रकार से जो हत्यारे थे वह गिरफ्तार होते. उकसाने की बात कहीं से नहीं बनती है. इस पूरे मामले में जिस प्रकार आनंद मोहन जवानी में जेल गए उसका हिसाब कौन देगा? मैं न्यायालय के निर्णय पर टिप्पणी नहीं कर रहा हूं. अश्विनी चौबे ने आगे कहा कि लालू यादव को नीतीश कुमार और ललन सिंह ने जेल भेजा, आजकल गलबहिया कर रहे हैं. अब दोनों गलबहियां कर तीसरे आनंद मोहन को जिनकी राजनीतिक हत्या इन लोगों ने की थी उनसे गलबहियां कर रहे हैं. इससे कोई अंतर पढ़ने वाला नहीं है. बिहार में बाहुबलियों की सरकार मामले पर कहा कि बिहार में हत्या, बलात्कार, अपराध लगातार देखने को मिलता है. यह गठबंधन नहीं है, महाठगबंधन है. बिहार आज बारूद के ढेर पर है जहां एक तरफ पीएफआई का आतंक है.

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