यह त्योहार सिख नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है.
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यह त्योहार सिख नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है.

बेसाखी का त्यौहार पूरी हिन्दू और सिख घर्मो के लिए बहुत खास है. बैसाखी 14 अप्रैल को मुख्यत पंजाब और हरियाण में बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाई जाती है लेकिन सिख धर्म मनाने वाले के लोग इस त्यौहार को बहुत विशेष मानते है. बैसाखी का दिन सिख धर्म के नए वर्ष के रूप में भी मनाया जाता है. बैसाखी के कई अलग-अलग नाम हैं. इसे असम में बिहू, बंगाल में नबा वर्षा, केरल में पूरम विशु कहते हैं. बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं.

बैसाखी का इतिहास
30 मार्च, 1699 को सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी. उन्होंने सिख समुदाय के सदस्यों से गुरु और भगवान के लिए खुद को बलिदान करने के लिए आगे आने के लिए कहा था. आगे आने वालों को पंज प्यारे कहा जाता था, जिसका अर्थ था गुरु के पांच प्रियजन, बाद में, बैसाखी के दिन महाराजा रणजीत सिंह को सिख साम्राज्य का प्रभार सौंप दिया गया, महाराजा रणजीत सिंह ने तब एक एकीकृत राज्य की स्थापना की. इसी के चलते ये दिन बैसाखी के तौर पर मनाया जाने लगा.
इस दिन कई जगहों पर मेले भी लगते है. बेसाखी के दिन सिख धर्म के लोग सुबह गुरूद्वारे जाते है जहाँ इस दिन के लिए खास अरदास की जाती है. इस दिन पंजाब में कई जगहों पर लंगर भी लगता है. स्वर्ण मंदिर यानि गोल्डन टेम्पल में बैसाखी का पर्व बड़े चाह से मनाया जाता है.
सिखों के नौवे गुरु श्री गुरु अमर दास जी ने हिन्दुओं के 3 त्योहारों को मनाने का आदेश दिया था, उन तीन त्योहारों में थे बैसाखी, दिवाली और महाशिवरात्रि. बैसाखी त्योहार की कहानी शुरू होती है गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी से. जब औरंगज़ेब ने गुरु तेग बहादुर जी को इस्लाम धर्म कबूलने के लिए कहा था लेकिन उन्होंने मना कर दिया। गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी अगले सिख गुरु बने और बेसाखी के ही दिन उन्होंने सिख सेना बनाने का फैसला लिया ताकि औरंगज़ेब के आत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठाई जाए।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने हज़ारो लोगों को आनंदपुर साहिब में लोगों को सम्बोधन करते हुए कहा “जो भी अपने गुरु के लिए अपनी जान दे सकता है वो, आगे आये.” एक व्यक्ति आया और फिर गुरु गोबिंद जी उसे एक टेंट में ले गए और फिर कुछ देर बाद जब बाहर आये तो उनकी तलवार खून से लाल थी. गुरु गोबिंद सिंह जी ने दोबारा कहा कि जो भी अपनी जान गुरु के लिए दे सकता है आगे आये. फिर एक व्यक्ति आया जिसे गुरु जी टेंट में ले गए और दोबारा खून से लाल तलवार लेकर बाहर आ गए. ऐसा उन्होंने 5 बार किया
सभी लोग बहुत चिंतित थे कि गुरु जी ये क्या कर रहे है. फिर कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह जी टेंट के अंदर गए और उन पांचों के सिर पगड़ी बाँध कर बाहर ले आये और उन पाँचों को “पंज पियारे” के नाम से नवाजा गया.ये वो 5 लोग थे जिन्हें गुरु गोबिंद सिंह ने अपनी खालसा फ़ौज में शामिल किया था. इसके बाद हजारो लोग खालसा की फोज में शामिल हुए और औरंजेब को मुंहतोड़ जवाब दिया.

बैसाखी का महत्व
इस महीने में रबी की फसल पककर पूरी तरह से तैयार हो जाती है और उनकी कटाई भी शुरू हो जाती है. इसीलिए बैसाखी को फसल पकने और सिख धर्म की स्थापना के रूप में मनाया जाता है. ऐसा कहा जाता है कि इसी दिन सिख पंथ के 10वें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी. तभी से बैसाखी का त्योहार मनाया जाता है. इस दिन से सिखों के नए साल की शुरुआत होती है.
बैसाखी के दिन गुरुद्वारों को सजाया जाता है. सिख समुदाय के लोग गुरुवाणी सुनते हैं. घरों में भी लोग इस दिन विशेष पूजा-अर्चना करते हैं.. खीर, शरबत आदि पकवान बनाए जाते हैं. इस दिन शाम के समय घर के बाहर लकड़ियां जलाई जाती हैं. जलती हुई लकड़ियों का घेरा बनाकर गिद्दा और भांगड़ा कर अपनी प्रसन्नता जाहिर करते हैं, लोग गले लगकर एक दूसरे को बैसाखी की शुभकामनाएं देते हैं.

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